अंग्रेजो की कूटनीति का पुरीशंकराचार्य द्वारा विश्लेषण

0
169

स्वतंत्रता संग्राम के चरम चरण में अंग्रेजो ने भारत का आकलन किया , उनने भारत को दिशाहीन करने की भावना से एक कूटनीति का प्रयोग किया , कि राजनेताओ में से ही किसी वरिष्ठ राजनेता को महात्मा के रूप में ख्यापित किया जाए , तो व्यासपीठ से सम्बद्ध जो आचार्य है परम्परा के शंकराचार्य आदि वह अन्यथा सिद्ध हो जाएगे !

 

किसी की उपयोगिता को आप निरस्त कर दीजिए , उसका आस्तित्व विलीन हो गया , अन्यथा का अर्थ क्या है , यह न्याय दर्शन का शब्द है वेदांत में भी प्रयुक्त होता है , किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति को आप छल , बल डंके की चोट से अन्यथा सिद्ध कीजिए हो तो नहीं सकता वह लेकिन आस्तित्व रहने पर भी उपयोगिता समाप्त हो गयी , निरस्त कर दिया गया !

 

तो यह अंग्रेजो की कूटनीति थी , मै निन्दा की दृष्टि से कुछ नहीं कहूँगा , सबसे पहले रविन्द्रनाथ टैगोर जी ने गांधीजी को महात्मा शब्द से संबोधित किया , यह इतिहास है ! वह अनुकृति विश्व व्यापी बन गयी , तब हुआ क्या , एक राजनेता जब संत के रूप में ख्यापित कर दिए गए , उसके पीछे अंग्रेजो की कूटनीति थी कि अपने आप सनातन वर्ण व्यवस्था के पक्षधर स्वामी श्री करपात्री जी महाराज आदि अन्यथा सिद्ध हो जाए !

 

अर्थ क्या हुआ ?

श्री मोहन भागवत जी दिल्ली में मेरे पास आए थे , मैंने वेदना और व्यंग दोनों को मिलकर उनसे कहा >>>>> आपका क्या कहना , आप महानुभावो का क्या कहना , आप स्वयं ही शिवाजी स्वयं ही रामदासजी , स्वयं ही चाणक्य स्वयं ही चन्द्रगुप्त , स्वयं ही शंकराचार्य जी स्वयं ही सुधन्वाजी , स्वयं ही पृथु जी स्वयं ही भृगु जी और आगे चले स्वयं ही ध्रुव , प्रहलाद और स्वयं ही नारद जी , समझ रहे है ना !

 

यह कूटनीति जो अंग्रेजो ने दी नकलची भारत ने इसे बहुत विकसित किया , भारत के प्रथम प्रधानमंत्रीजी ने अंग्रेजो की कूटनीति को विकसित करने की भावना से भारत साधू समाज की स्थापना की , भारत साधू समाज का उद्येश्य क्या था ?

 

स्वामी करपात्री जी महाराज , हमारे गुरुदेव के सानिध्य में , पूरा व्यस्तंत्र आ गया था , नेपाल , भूटान , पाकिस्तान , बांग्लादेश , और भारत इन सब देशो के संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान् , समाज शास्त्र व् अर्थशास्त्र के पारखी मनीषी , तीनो पीठ के शंकराचार्य श्रंगेरी वाले प्रायः सम्मलित नहीं होते थे , बाकि सभी धर्मसंघ के मंच पर होते थे , आप समझ सकते है कितना विशाल प्रारूप रहा होगा !

 

उस प्रारूप को नष्ट करने के लिए भारत साधू समाज की रचना की गयी , यहाँ तक कह दिया नेहरु जी ने जो व्यक्ति भारत साधू समाज की सदस्यता ग्रहण नहीं करेगे वे भिक्षुक गिने जाएंगे और जेल के शिकंजे में डाल दिए जाएंगे , यह इतिहास है !

 

तब पुरषोत्तम दास टंडन जी ने बताया नेहरु जी को जाकर , अरे नेहरु जी क्या करते हो सचमुच के संत तो जेल के शिकंजे में डाल दिए जाएंगे और मजनू के सामान मलाई चाटने वाले तुम्हारे मंच की शोभा बढाएँगे , तुम कांग्रेस के लिए वरदान सिद्ध होना चाहते हो ,जो संत तुम्हारी चपेट में आते है , हो जाए , यह मत कहो की जो भारत साधू समाज की सदस्यता ग्रहण नहीं करेंगे तो जेल के शिकंजे में होंगे और भिखारी गिने जाएंगे !

 

फिर कूटनीति चली , गुलजारीलाल नंदा उनसे भी मै परिचित था , उन्ही को आगे करके भारत साधू समाज की स्थापना की गयी , लेकिन जो जो अध्यक्ष बने पूज्य अखंडानंदजी महाराज आदि जो जो अध्यक्ष बनाए गए वो सभी हमारे पूज्य गुरुदेव के अनुगत हो गए , भारत साधू समाज की योजना निरस्त हो गयी , हमारे पूज्य गुरुदेव के प्रभाव के कारण !

 

नेहरु जी को जहा जाना था देह त्याग के बाद वहा पहुँच गए ,उस समय मै दिल्ली में ही था इसी वेश में था , जो कुछ हुआ मुझे मालूम है , उसके बाद विनोबा जी जो कि गाँधी जी के अनुयायी थे , उनको राष्ट्रिय संत के रूप में उदभाषित किया गया , उनकी योजनाओं को कांग्रेस ने पूरा बल दिया फिर विनोबा जी भी चल बसें !

 

अब मान्य दलाई लामा जी को विश्व हिन्दू परिषद् ने , आरएसएस ने , कांग्रेस ने , भाजपा ने , सपा ने , बसपा ने , नितीश जी की पार्टी ने , लालूजी की पार्टी ने सबने भारत के सार्वभौम धर्म गुरु के रूप में स्वीकार किया !

 

शंकराचार्य का स्थान भारत में आज सरकार की दृष्टि में मान्य दलाई लामा जी के सामने नगण्य माना जाता है , हमारे रामदेव बाबा का महान उत्सव होता है , दलाई लामा जी को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाते है , विश्व हिन्दू परिषद् , आरएसएस के जितने आध्यात्मिक ,धार्मिक ढंग के कार्यक्रम होते है उसमे दलाई लामा जी को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया जाता है , यह मैंने संकेत किया !

 

निन्दा में तात्पर्य नहीं है दलाई लामा जी हमारा कितना सम्मान करते है उनका लिखा हस्ताक्षर सहित पत्र हमारे पास आज भी है , यह सब आपलोग नहीं जानते !

 

उसके बाद विश्व हिन्दू परिषद् ने क्या किया ऊपर तो दलाई लामा जी को रखा और निचे धर्म संसद बना ली ….धर्म संसद का अर्थ था कि उसके माध्यम से भाजपा के प्रचारक संत और कथावाचक बन जाए और हम भाजपा के माध्यम से शासन करते रहे , अब चारो कुम्भ पर अधिकार हो गया न , धर्म संसद का , उनके सदस्यों का और कोई भी दंडी स्वामी को उद्गोषित कर देते है शंकराचार्य के रूप में , चार शंकराचार्य होते ही है उनके मंच पर होते है मतलब , किसी भी दंडी स्वामी को बैठाकर कहते है चार शंकराचार्य हमारे समर्थन में है !

 

यह सारा दृश्य मैंने नग्न रूप से इसलिए खीचा कि आपके ह्रदय में कोई कठनाई न रह जाए समझने में , सांकेतिक भाषा में तो तब बोलूं जब आपको सब पता हो !

 

हम यहाँ लाकर खड़े कर दिए गए , कंहा लाकर , जहाँ व्यासपीठ अन्यथा सिद्ध हो जाए , यह कूटनीति की परम्परा चली , अब आगे चलिए !

 

जहाँ निन्दा का प्रयोग होता है वहां निन्दा का तात्पर्य निंद की निन्दा में नहीं होता , जिसकी प्रशंसा अभीष्ट है , उसकी प्रशंसा में होता है , किसी की निन्दा में मेरे तात्पर्य नहीं है !

 

अब क्या हो गया , मिशन के संत बनाए जाने लगे , रामकृष्ण मिशन सबसे पहले , तब दयान्द मिशन , चिन्मय मिशन और भी बहुत से मिशन है उनकी निन्दा में तात्पर्य नहीं है , वो जो वैकल्पिक संत बनाए गए वे सभी अंग्रेजी पढ़े लिखे , डाक्टर , इंजिनियर ढंग के थे उनको दो ढाई वर्ष का प्रशिक्षण दिया गया , पर्याप्त था !

 

इसका अर्थ है उनके सिद्धांत को समझकर जनता तक ले जाने के लिए , सेवा का प्रकल्प चलाने के लिए जिस योग्यता से संपन्न संत चाहिए उन्होंने बना लिए , तो मिशन के संतो ने अपनी उपयोगिता इतनी सिद्ध की , बाहर से , कि परम्परा के संत उनके सामने एक प्रकार से निरस्त हो गए , अन्यथा सिद्ध हो गए यह भी एक प्रकल्प है !

 

जिसके बिना राष्ट्र चल नहीं सकता उसकी कितनी दुर्दशा है , यह समझने की आवश्यकता है , अब आगे विचार कीजिए हुर्रियत के नेताओ ने प्रतिबंधित उल्फा के नेताओ ने संत , कथावाचक बनाकर घुमाना प्रारम्भ किया , रामायण , महाभारत के कथावाचक , ब्राह्मण , क्षत्रिय , वेश्य व्यक्तियों को , उसके बाद पॉप महोदय , उनके जो प्रकल्प चलते है उनके पादरियों ने क्या किया कथावाचक संत बनाकर घुमाना प्रारंभ किया , मओवादियो ने संत बना दिए एक एक संत को इनका समर्थन प्राप्त है !

 

अब यह लोग जिसको विकास समझते है , कहते है , अंग्रेजो की दृष्टि में वह उनकी दुरासंधि है कूटनीति है यह समझ नहीं पाते !

 

!! हर हर महादेव !!

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY